नवरात्री में क्यों करवाया जाता है कन्या भोज ?

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नवरात्र‍ि के नौ दिन मां के नौ रूपों की पूजा होती है और कन्या पूजन के जरिये मां के उन नौ रूपों की एक साथ पूजा की जाती है और उनसे अपने घर-परिवार पर कृपा बनाए रखने व अगले साल आने का अनुरोध किया जाता है.

कन्या पूजन सप्तमी से ही शुरू हो जाता है. 2 साल से 11 साल तक के उम्र की कन्याओं को पूजा जाता है. माना जाता है कि कन्याओं का देवियों की तरह आदर सत्कार और भोज कराने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और अपने भक्तों को सुख समृधि का वरदान देती हैं.

कन्या पूजन में 2 से 11 साल की 9 बच्च‍ियों की पूजा की जाती है. दरअसल, दो वर्ष की कुमारी, तीन वर्ष की त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी, पांच वर्ष की रोहिणी, छः वर्ष की बालिका, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती है.

सभी शुभ कार्यों का फल प्राप्त करने के लिए कन्या पूजन किया जाता है. कुमारी पूजन से सम्मान, लक्ष्मी, विद्या और तेज प्राप्त होता है. इससे विघ्न, भय और शत्रुओं का नाश भी होता है. होम, जप और दान से देवी इतनी प्रसन्न नहीं होतीं जितनी कन्या पूजन से.

देवी पुराण के अनुसार इंद्र ने जब ब्रह्मा जी से भगवती को प्रसन्न करने की विधि पूछी तो उन्होंने सर्वोत्तम विधि के रूप में कुमारी पूजन ही बताया.

नौ कुमारी कन्याओं और एक कुमार को विधिवत घर में बुलाकर और उनके पांव धोकर रोली-कुमकुम लगाकर पूजा-अर्चना की जाती है. इसके बाद उन्हें वस्त्र आभूषण, फल पकवान और अन्न आदि दिया जाता है.

2 वर्ष से लेकर 11 वर्ष की कन्याएं साक्षात माता का स्वरूप मानी जाती हैं. प्रतिपदा से लेकर नवमी तक एक-एक बढ़ोतरी के साथ अर्थात पहले दिन एक, दूसरे दिन दो, तीसरे दिन तीन..नवें दिन नौ कन्याओं का पूजन और भोज कराने से मनवांछित फल प्राप्त होता है. दुर्गापूजा के आठवें दिन महागौरी की उपासना का विधान है. इनकी शक्ति अमोघ और सद्य: फलदायिनी है.

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